राज्‍यों और शहरी स्‍थानीय निकायों में क्षमता निर्माण के लिए नीति आयोग 16 व 17 जून, 2016 को जल, अपशिष्ट जल एवं ठोस कचरे के प्रबंधन पर कार्यशाला आयोजित करेगा

नीति आयोग ने सिंगापुर सहयोग उद्यम (एससीई) और सिंगापुर स्थित टेमासेक फाउंडेशन से गठबंधन करके शहरी क्षेत्र में राज्‍य सरकारों एवं शहरी स्‍थानीय निकायों (यूएलबी) के अधिकारियों के क्षमता निर्माण के लिए एक शहरी प्रबंधन कार्यक्रम विकसित किया है। इस कार्यक्रम का शुभारंभ 27 अप्रैल, 2016 को नई दिल्‍ली में किया गया था। इस कार्यक्रम के तहत शहरों के कायाकल्‍प से जुड़े इन तीन महत्‍वपूर्ण क्षेत्रों में राज्‍य सरकारों और शहरी स्‍थानीय निकायों के अधिकारियों के क्षमता निर्माण पर ध्‍यान केन्द्रित किया गया है- (i) शहरी नियोजन एवं गवर्नेंस, (ii) जल, अपशिष्‍ट जल एवं ठोस कचरे का प्रबंधन और (iii) शहरी बुनियादी ढांचे का सार्वजनिक वित्‍त पोषण (पीपीपी)। सिंगापुर सहयोग उद्यम (एससीई) और सिंगापुर स्थित टेमासेक फाउंडेशन के साथ नीति आयोग की यह अनोखी पहल इन महत्‍वपूर्ण क्षेत्रों में शहरी कायाकल्‍प के सामने मौजूद चुनौतियों को राज्‍य सरकारों/यूएलबी के साथ साझा करने और सिंगापुर के शहरी क्षेत्र विशेषज्ञों के साथ भागीदारी के जरिये इनमें से कुछ चुनौतियों के कारगर समाधान को विकसित एवं डिजाइन करने का एक प्‍लेटफॉर्म मुहैया कराती है। सात राज्‍य जैसे कि तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, महाराष्‍ट्र, गुजरात, उत्‍तर प्रदेश, दिल्‍ली और असम इस कार्यक्रम में भाग ले रहे हैं। सिंगापुर के विशेषज्ञ सुरबाना जुरोंग, सीएच2एम हिल और प्राइसवाटरहाउसकूपर्स से जुड़े हुए हैं। 27 अप्रैल, 2016 को इस कार्यक्रम के शुभारंभ के बाद शहरी नियोजन एवं गवर्नेंस पर पहली कार्यशाला 28 एवं 29 अप्रैल, 2016 को नई दिल्‍ली में आयोजित की गई थी। अब जल, अपशिष्‍ट जल एवं ठोस कचरे के प्रबंधन से जुड़े इस शहरी प्रबंधन कार्यक्रम के तहत दूसरी कार्यशाला 16 एवं 17 जून, 2016 को नई दिल्‍ली में आयोजित की जाएगी।

नई दिल्‍ली में 16 और 17 जून 2016 को जल, अपशिष्‍ट जल एवं ठोस कचरे के प्रबंधन पर होने वाली दूसरी कार्यशाला में निम्नलिखित क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा –

(i) पानी संबंधी टिकाऊ एवं लचीले बुनियादी ढांचे और स्वस्थ शहरों के लिए एकीकृत शहरी जल चक्र प्रबंधन – सिंगापुर की सफलता की कहानी, टिकाऊ जल प्रबंधन, एकीकृत जल चक्र प्रबंधन, दक्ष जल आपूर्ति प्रबंधन, उपयोग किए जा चुके पानी (अपशिष्ट जल) का प्रबंधन, अपशिष्ट जल के प्रशोधन के लिए विभिन्न प्रौद्योगिकियों का मूल्यांकन, पानी एवं उपयोगिता संबंधी वित्तीय प्रदर्शन का वैकल्पिक स्रोत, वर्षा जल का संचयन, सार्वजनिक शिक्षा, संचार एवं हितधारकों की संलग्‍नता, जल/अपशिष्ट जल परियोजनाओं की आपूर्ति श्रृंखला का कार्यान्वयन, जल संरक्षण, मांग प्रबंधन और कारगर एनआरडब्‍ल्‍यू प्रबंधन, उभरती प्रवृत्तियां और भविष्य।

(ii) ठोस कचरे का प्रबंधन – सिंगापुर की ठोस कचरा प्रबंधन प्रणाली से परिचय, एकीकृत ठोस कचरा प्रबंधन में सर्वोत्तम तौर-तरीके, कचरे को न्‍यूनतम करना एवं (3 आर) कम करना, पुनर्चक्रण और पुन: उपयोग, कचरा निपटान प्रणाली, ठोस कचरा प्रबंधन के लिए विभिन्न प्रौद्योगिकियों का आकलन, कचरे से ऊर्जा (भस्मीकरण), परियोजना वितरण मॉडल एवं पीपीपी और ठोस कचरा परियोजनाओं की आपूर्ति श्रृंखला का कार्यान्वयन।

कार्यशाला का उद्घाटन नीति आयोग के सीईओ श्री अमिताभ कांत करेंगे। प्रतिभागियों में तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और असम की राज्य सरकारों के सचिव, वरिष्ठ अधिकारीगण एवं नगर निगम आयुक्त शामिल होंगे। इनके अलावा केन्‍द्रीय शहरी विकास मंत्रालय, आवास एवं गरीबी उन्‍मूलन मंत्रालय, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, पेयजल एवं स्‍वच्‍छता मंत्रालय, विज्ञान एवं प्रौ़द्योगिकी मंत्रालय, राष्‍ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, नीति आयोग इत्‍यादि के प्रतिनिधि भी प्रतिभागियों में शामिल होंगे। विभिन्‍न संस्‍थानों जैसे कि शहरी मामलों के राष्ट्रीय संस्थान (एनआईयूए) और दिल्‍ली स्थित स्‍कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर इत्‍यादि के विशेषज्ञ भी इस कार्यशाला में शिरकत करेंगे।

पृष्‍ठभूमि :

शहरीकरण से भारत को उच्‍च आर्थिक विकास हासिल करने का अवसर मिल रहा है, क्‍योंकि शहर विभिन्‍न समुदायों की अर्थव्‍यवस्‍थाओं को सुलभ कराते हैं। भारत में शहरीकरण का स्‍तर वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक तकरीबन 31 प्रतिशत था, जिसके वर्ष 2030 तक बढ़कर 40 प्रतिशत के स्‍तर पर पहुंच जाने का अनुमान है। वैसे तो शहरीकरण का स्‍तर मामूली प्रतीत हो सकता है, लेकिन निरपेक्ष संख्‍या के लिहाज से यह बेहद ज्‍यादा है। भारत की शहरी आबादी संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका अथवा ब्राजील की पूरी आबादी से भी अधिक है। शहरी अर्थव्‍यवस्‍था में भी उल्‍लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है और यह सकल घरेलू उत्‍पाद (जीडीपी) में लगभग 60 प्रतिशत का योगदान दे रही है। हालांकि, शहरीकरण का पूर्ण लाभ उठाने के लिए इसका कारगर और टिकाऊ होना अत्‍यावश्‍यक है।
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